भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डॉ. विक्रम साराभाई की जयंती: विज्ञान और नवाचार का अविस्मरणीय सफर

Mandeep Singh Sajwan
Dr. Vikram Sarabhai का चित्र: भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक की जयंती पर श्रद्धांजलि पाठ सहित।

नई दिल्ली: 12 अगस्त, 2025 को पूरा देश 'भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक' और महान वैज्ञानिक डॉ. विक्रम साराभाई की 106वीं जयंती मना रहा है। इस अवसर पर राष्ट्र ने उन्हें शत्-शत् नमन किया और विज्ञान एवं नवाचार के क्षेत्र में उनके अविस्मरणीय योगदान को याद किया। डॉ. साराभाई की दूरदृष्टि और वैज्ञानिक दृष्टिकोण आज भी अनुसंधान के क्षेत्र में रुचि रखने वाले युवाओं के लिए एक प्रेरणास्रोत है।


डॉ. विक्रम अंबालाल साराभाई का जन्म 12 अगस्त, 1919 को अहमदाबाद में हुआ था। उनका जीवन और कार्य भारत के लिए न केवल एक वैज्ञानिक उपलब्धि है, बल्कि यह एक सशक्त राष्ट्र निर्माण का भी प्रतीक है। उन्होंने भारत को अंतरिक्ष युग में लाने का सपना देखा और उसे सच कर दिखाया।


ISRO की स्थापना और दूरदृष्टि:

डॉ. साराभाई का सबसे महत्वपूर्ण योगदान भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की स्थापना है। 1962 में, जब भारत एक युवा राष्ट्र था, उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति (INCOSPAR) की स्थापना की, जो बाद में ISRO में तब्दील हो गई। उनका मानना था कि अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का उपयोग राष्ट्र के विकास के लिए किया जा सकता है, विशेषकर संचार, मौसम विज्ञान और शिक्षा के क्षेत्र में।


एक बार उन्होंने कहा था, 

"ऐसे लोग हैं जो विकासशील राष्ट्रों में अंतरिक्ष गतिविधियों की प्रासंगिकता पर सवाल उठाते हैं। हमारे लिए, उद्देश्य की कोई अस्पष्टता नहीं है। हमारा मानना है कि हमें राष्ट्रीय स्तर पर और राष्ट्रों के समुदाय में एक सार्थक भूमिका निभानी चाहिए।" 

उनकी यह दूरदृष्टि आज ISRO की सफलताओं में साफ झलकती है।

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अंतरिक्ष के अलावा अन्य क्षेत्रों में योगदान:

डॉ. साराभाई का प्रभाव केवल अंतरिक्ष तक सीमित नहीं था। उन्होंने कई अन्य महत्वपूर्ण संस्थानों की स्थापना में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


  1. भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (PRL): 1947 में उन्होंने अहमदाबाद में इस प्रयोगशाला की स्थापना की, जो आज अंतरिक्ष और विज्ञान के क्षेत्र में अनुसंधान का एक प्रमुख केंद्र है।
  2. भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIM), अहमदाबाद: वे IIM-A की स्थापना के पीछे भी एक प्रमुख शक्ति थे, जिसका उद्देश्य देश में प्रबंधन शिक्षा को बढ़ावा देना था।
  3. विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर (VSSC): केरल के थुंबा में स्थित यह केंद्र आज भारत के रॉकेट अनुसंधान का गढ़ है और इसका नाम उन्हीं के सम्मान में रखा गया है।
  4. फास्ट ब्रीडर टेस्ट रिएक्टर (FBTR), कल्पक्कम: उन्होंने परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।


विज्ञान को आम लोगों तक पहुँचाने का जुनून:

डॉ. साराभाई का एक और महत्वपूर्ण उद्देश्य विज्ञान को समाज के हर वर्ग तक पहुँचाना था। उन्होंने 1975 में सैटेलाइट इंस्ट्रक्शनल टेलीविज़न एक्सपेरिमेंट (SITE) की शुरुआत की, जिसने ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा और विकास को बढ़ावा देने के लिए उपग्रह प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल किया। यह दुनिया का सबसे बड़ा सामाजिक प्रयोग था और इसने भारत में दूरस्थ शिक्षा की नींव रखी।

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पुरस्कार और सम्मान:

राष्ट्र ने डॉ. साराभाई के अद्वितीय योगदान को मान्यता दी। उन्हें 1966 में पद्म भूषण और मरणोपरांत 1972 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। उनके नाम पर कई शैक्षणिक और वैज्ञानिक संस्थानों का नाम रखा गया है।


आज जब भारत चंद्रयान-3 की ऐतिहासिक सफलता के बाद अंतरिक्ष में नई ऊंचाइयों को छू रहा है, तब हम डॉ. विक्रम साराभाई के योगदान को विशेष रूप से याद करते हैं। उनका सपना था कि भारत खुद अपनी अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी विकसित करे और आत्मनिर्भर बने। आज ISRO की आत्मनिर्भरता और वैश्विक सफलता उनके उसी सपने का साकार रूप है।


डॉ. साराभाई ने हमें सिखाया कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र के समग्र विकास का एक अभिन्न अंग है। उनकी जयंती पर, हमें उनके आदर्शों को अपनाते हुए विज्ञान और नवाचार के माध्यम से एक सशक्त और विकसित भारत के निर्माण का संकल्प लेना चाहिए।

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