उत्तराखंड: रेमेडिसिविर इंजेक्शन की कालाबाजारी रोकने के लिए सरकार ने ड्रग इंस्पेक्टरों को मैदान में उतारा

हाईकोर्ट के आदेश के बाद हरकत में आई सरकार ने रेमेडिसिविर इंजेक्शन की कालाबाजारी को रोकने के लिए सभी ड्रग इंस्पेक्टरों को अपने-अपने क्षेत्र में सघन

रेमडेसिविर दवा
रेमडेसिविर दवा 

 हाईकोर्ट के आदेश के बाद हरकत में आई सरकार ने रेमेडिसिविर इंजेक्शन की कालाबाजारी को रोकने के लिए सभी ड्रग इंस्पेक्टरों को अपने-अपने क्षेत्र में सघन निरीक्षण का आदेश जारी किया है। इसका मतलब यह भी है कि प्रदेश में अब रेमेडिसिविर इंजेक्शन के मामले में हर दवा की दुकान की जांच होगी। 



प्रभारी स्वास्थ्य सचिव पंकज  पांडेय की ओर से जारी आदेश में ड्रग इंस्पेक्टरों से कहा गया है कि वे अपने क्षेत्र की हर दवा की दुकान की जांच कर यह तय करें कि रेमेडिसिविर इंजेक्शन की जमाखोरी तो नहीं हो रही है या तय कीमत से अधिक दाम पर इंजेक्शन तो नहीं बेचा जा रहा है। ड्रग इंस्पेक्टरों को यह भी कहा गया है कि यह भी देखा जाए कि रेमेडिसिविर इंजेक्शन के पैक पर क्यूआर कोड है या नहीं। ड्रग  इंस्पेक्टरों से कमी मिलने पर संबंधित दुकानदार के खिलाफ कार्रवाई करने को कहा गया है। 



प्रदेश सरकार का अभी तक दावा रहा है कि प्रदेश में रेमेडिसिविर इंजेक्शन की कोई कमी नहीं है। इतना होने के बाद भी इंजेक्शन की कमी की शिकायतें प्रशासन को मिल रही हैं। यह मामला हाईकोर्ट भी पहुंचा था और कोर्ट ने सरकार को इंजेक्शन की कोई कमी न होने देने का आदेश दिया था। सरकार का मानना है कि इंजेक्शन की कमी नहीं है लेकिन जमाखोरी और इंजेक्शन की कालाबाजारी के कारण यह समस्या सामने आ रही है। इसी समस्या से पार पाने के लिए अब शासन ने ड्रग इंस्पेक्टरों की फौज को मैदान में उतारा है। सचिव अमित नेगी के मुताबिक प्रदेश में रेमेडिसिविर इंजेक्शन की कमी नहीं है और मांग के हिसाब से उपलब्धता है। केंद्र सरकार से भी दो हजार रेमेडिसिविर इंजेक्शन मिल गए हैं।


कोरोना सैंपल जांच प्रकरण: मेडिकल कॉलेज के स्टाफ की संलिप्तता भी आ रही सामने

राजकीय दून मेडिकल कॉलेज की लैब में बाहर के सैंपल की जांच के मामले में प्रथम दृष्टया कॉलेज और अस्पताल के स्टाफ की संलिप्तता भी सामने आ रही है। प्राथमिक जांच में पता लगा है कि सैंपल देने वाले व्यक्ति का फॉर्म भरने से लेकर एसआरएफआईडी जनरेट होने तक पूरी प्रक्रिया की गई। एसआरएफआईडी बाहर का कोई व्यक्ति जनरेट नहीं कर सकता है। यह भी पता लगा है कि सैंपल लेने वाला व्यक्ति कॉलेज और अस्पताल से बाहर का है। सैंपलिंग की एवज में उसके पैसे लेने की बात प्रथम दृष्टया सामने नहीं आई है। पूरे मामले की जांच एक समिति को सौंपी गई है।


बता दें, मेडिकल कॉलेज की लैब में कुछ ऐसे भी सैंपल आ रहे थे, जिन्हें दून अस्पताल से लिए नहीं लिया जाता। एक निजी लैब का कर्मचारी डिमांड आने पर घर जाकर सैंपल लेता था। जिन्हें जांच के लिए दून मेडिकल कॉलेज भिजवाए जाते थे। मेडिकल कॉलेज स्टाफ की मिलीभगत के बिना यह संभव नहीं है।


मेडिकल कालेज में आरटीपीसीर सैंपल की मुफ्त जांच होती है। जबकि इन सैंपल की एवज में पैसे लिए जाने के आरोप लग रहे हैैं। मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. आशुतोष सयाना का कहना है कि जो भी इसमें संलिप्त है, उनको चिह्नित किया जाएगा। मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय कमेटी बना दी है। जल्द ही यह समिति अपनी रिपोर्ट देगी। 

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