आपदा में चट्टान बनी महिला शक्ति: चार अफसरों ने दिखाई अपनी संवेदनशीलता और सहनशीलता

चमोली जिले में सात फरवरी को आए जल प्रलय में जब लोगों की हिम्मत जवाब देने लगी तब चार महिला अधिकारियों ने मोर्चा संभाला।

स्वाति सिंह भदौरिया - फोटो : सोशल मीडिया
स्वाति सिंह भदौरिया - फोटो : सोशल मीडिया

 चमोली जिले में सात फरवरी को आए जल प्रलय में जब लोगों की हिम्मत जवाब देने लगी तब चार महिला अधिकारियों ने मोर्चा संभाला। बिना समय गंवाए उन्होंने राहत कार्य शुरू किए, मौके पर भी पहुंचीं और अगले कुछ दिन तक बिना किसी और बात की परवाह किए बचाव चट्टान की तरह डटी रहीं। जानिए उन्हीं की जुबानी क्या हुआ उस दिन और कैसे उन्होंने हालात संभाला...

स्वाति सिंह भदौरिया, जिलाधिकारी, चमोली


दो घंटे के भीतर आपदा स्थल पहुंची, 11 दिन वहीं डटी रही

तपोवन में जल प्रलय की सूचना मुझे सुबह 10:40 बजे मिली तो मैंने तुरंत बचाव कार्यों के लिए टीम को अलर्ट किया। हमारा लक्ष्य गांवों में लोगों को बचाना था। सूचना पाकर पांच मिनट में मैं गोपेश्वर से तपोवन के लिए निकल गई थी। दो घंटे बाद मैं मौके पर पहुंची। मेरा बेटा साढ़े तीन साल का है, जिससे मैं तीन दिन तक नहीं मिली थी, मुझे उसकी चिंता तो थी लेकिन मेरा पूरा ध्यान सुरंग में फंसे लोगों को निकालने पर था।



स्थिति जब काबू में आई तो तीन दिन बाद बेटे को जोशीमठ लेकर आई, इसके बावजूद मैं उससे सिर्फ रात को ही कुछ देरके लिए मिल पाती थी। दिन-रात घटना स्थल पर फंसे लोगों को जीवित बचाने की मुहिम में टीम के साथ डटी रही। 18 फरवरी यानी 11 दिन बाद गोपेश्वर लौटी, अभी भी मौके पर जाती हूं क्योंकि इस मिशन के कई काम बाकी हैं।


एनटीपीसी से मानचित्र मंगा समझा हालात

बागेश्वर से तपोवन तक के सफर में भी मैंने राहत और बचाव कार्य तेज करने के साथ मिशन में मदद कर रही अन्य एजेंसियों के लिए जरूरी संसाधन मुहैया कराने की व्यवस्था की। बचावकर्मियों के  तेजी से चलाए अभियान का ही नतीजा था कि दो छोटी सुरंग में फंसे 25 लोगों को जीवित बचाया गया।


मौके पर सब कुछ तबाह हो चुका था। हमने एनटीपीसी से क्षेत्र का मानचित्र मंगाया और उसकी मदद से बचाव अभियान शुरू किया, ताकि अधिक से अधिक लोगों की जान बचाई जा सके। आपदा में पुल टूटने से 13 गांवों का संपर्क टूट गया था। इन गांव के लोगों को खाद्य सामग्री और दवाएं उपलब्ध कराया ताकि उन्हें किसी तरह की परेशानी न हो।


संयम और धैर्य से काम करना सीखें

लड़कियां अब किसी से पीछे नहीं है। हिम्मत, संयम और धैर्य से काम करना सीखें, हर मुकाम को पाना संभव है। चुनौतियां अचानक आती हैं तभी तो असली परीक्षा होती है, उससे पार करने का लक्ष्य बनाना होगा, लक्ष्य को हासिल करने का जुनून होना चाहिए तभी वो सबकुछ मिल सकेगा जो सपना आप देख रही हैं। खुद को किसी से कम मत आंकिए, हमेशा सकारात्मक सोचें।

12 घंटे का सफर कर मौके पर पहुंची अपर्णा कुमार

आईपीएस अपर्णा कुमार
आईपीएस अपर्णा कुमार

अपर्णा कुमार, डीआईजी, सेक्टर हेडक्वार्टर, देहरादून, आईटीबीपी

अपर्णा कुमार यूपी कैडर की आईपीएस अधिकारी होने के साथ पर्वतारोही भी हैं। वे बताती हैं कि तपोवन में आपदा की सूचना सुबह 11 बजकर 15 मिनट पर मिली, तो मैंने अपनी पूरी बटालियन को अलर्ट कर दिया और तत्काल बचाव अभियान शुरू कराया। मैं खुद करीब बारह घंटे की यात्रा कर घटना वाले दिन रात 10 बजकर 15 मिनट पर जोशीमठ पहुंची।


आईटीबीपी की टीमें तपोवन के साथ रैणी गांव में राहत और बचाव कार्य में जुटी थीं, हमारी प्राथमिकता लोगों को समय रहते जीवितनिकालना था लेकिन सबकुछ तहस नहस होने से कुछ समझ नहीं आ रहा था कि मिशन की शुरुआत कहां से करनी है। बर्फ के बड़े-बड़े टुकड़े, ठंडे पानी और कीचड़ के बीच कठिन और डरावनी परिस्थिति में टीम ने पूरे जोश के साथ काम किया। आपदा की स्थिति में काम का ये मेरा पहला अनुभव था और मुझे मेरी टीम पर गर्व है।


एक लड़के पर विश्वास कर हम आगे बढ़े

स्थानीय लड़के ने बताया कि एक टनल में 12 लोग हैं, लेकिन वहां तक पहुंचने का कोई रास्ता नहीं था। टीम ने उस लड़के पर विश्वास कर जंगल के रास्ते से वहां तक पहुंचने का फैसला किया। काफी ऊंचाई से नीचे उतरने के लिए जवानों ने रस्सियों का सहारा लिया और मलबा हटाने का काम शुरू किया।


सुरंग का द्वार पत्थर से बंद हो गया था, जिसे बड़ी मेहनत से तोड़कर आने जाने का रास्ता बनाया गया। हर कोई डर रहा था, क्योंकि चारों तरफ मलबा और कीचड़ भरा था, डिप्टी कमांडेंट नितेश ने सुरंग में जाने का फैसला किया। हमारी कोशिश रंग लाई और शाम साढ़े पांच बजे बारह लोगों को सुरंग से जीवित निकाला गया। इसमें औली के कुछ छात्रों ने भी मदद की जो पर्वतारोहण का प्रशिक्षण ले रहे हैं।


बेटियां अनुशासन के साथ जीवन में आगे बढ़ें

जीवन में आगे बढ़ना है तो अनुशासन के साथ अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करना होगा। बेटियां अब हर क्षेत्र में आगे आ रही हैं। अब ऐसा कोई क्षेत्र नहीं, जहां बेटियां किसी से पीछे हों। मंजिल पाने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है, आराम से बैठकर कुछ भी हासिल नहीं होता है। लक्ष्य तय करें और उसे पाने के लिए आगे बढ़ें।

बस इतना पता था हादसा बड़ा है: नीरू गर्ग

नीरू गर्ग, डीआईजी, गढ़वाल रेंज
नीरू गर्ग, डीआईजी, गढ़वाल रेंज

नीरू गर्ग, डीआईजी, गढ़वाल रेंज

आईपीएस अधिकारी नीरू गर्ग बताती हैं कि आपदा में काम करने का ये उनका पहला अनुभव था। चमोली के तपोवन में आपदा की सूचना मिली थी, लेकिन असल में क्या हुआ है कुछ भी स्पष्ट नहीं था। देहरादून से तपोवन के लिए निकली तो मौके पर मौजूद बचाव दल से संपर्क कर स्थिति का जायजा लेती रही।


घटना स्थल पर पहुंची तो वहां का नजारा वीभत्स था, लगभग सबकुछ खत्म हो गया था, पानी की लहरें बता रही थीं वहां पर क्या हुआ था। हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती ये पता करना था कि लोग कहां-कहां पर काम कर रहे थे, उसी हिसाब से राहत और बचाव कार्य की योजना बनानी थी।


जांच पड़ताल के बाद सुरंग में लोगों के फंसे होने का पता चला। बिना देर किए मलबे का ढेर हटाने का सिलसिला शुरू हुआ और लोगों को जीवित निकाला गया।


बेटी की परीक्षा दे रही थी, हम जीवन तलाश रहे थे

मेरी नौ साल की बेटी है, उसकी परीक्षा थी। आपदा में लोगों की जिंदगी बचाने के मिशन में इस कदर जूझ रहे थे कि बेटी को परीक्षा की तैयारी कराना तो दूरउससे बात तक नहीं हो पाती थी।


रात को फोन पर बात होती थी। मैं उससे सिर्फ यही कहती थी कि अच्छे से पढ़ाई करना, हरिद्वार में मां ने बेटी का ध्यान रखा। दिन-रात जिंदगियों की तलाश में भटकते थे। अभियान के दौरान कई शव भी बरामद किए गए जो पहाड़ से आई आफत में कई फुट नीचे दबे हुए थे।


जो भी काम करें, दिल से करें

लड़कियों के लिए हर क्षेत्र में काम करने के पूरे अवसर हैं। अपनी रुचि को पहचानें और उस क्षेत्र में आगे बढ़े। क्षेत्र कोई भी हो दिल से काम करें, दुनिया आपका सम्मान करेगी। हिम्मत ही आपको बहुत आगे लेकर जाएगी।

बस एक ही मकसद... जिंदगी बचाना: रिद्धिम अग्रवाल

रिद्धिम अग्रवाल, डीआईजी, एसडीआरएफ
रिद्धिम अग्रवाल, डीआईजी, एसडीआरएफ

रिद्धिम अग्रवाल, डीआईजी, एसडीआरएफ, उत्तराखंड

रिद्धिम 2005 बैच की आईपीएस अधिकारी हैं। जब उन्हें आपदा की सूचना मिली तो सबसे पहले वे कंट्रोल रूम पहुंचीं। प्राथमिक सूचना के आधार पर कम से कम समय में राहत और बचाव कार्य की  रूपरेखा तैयार की, क्योंकि पहला मकसद आपदा में फंसी जिंदगियां बचाना था। मौके पर काम कर रही टीम को जरूरी संसाधन मुहैया करवाए गए। टीमों में समन्वय स्थापित कर संयुक्त रूप से मिशन को अंजाम दिया गया जिससे कई जीवन बचाए गए।


जोखिम लेकर पूरी टीम ने किया काम

पानी से खतरा बना हुआ था, इसके बावजूद टीम ने जोखिम लेकर बचाव अभियान शुरू किया ताकि अधिक से अधिक लोगों को बचाया जा सके। साथ ही दूसरे जिलों को अलर्ट किया, ताकि वहां की आबादी को कोई नुकसान न हो।


टीम की भूख-प्यास सब खत्म हो गई थी, जहां-तहां फंसे लोगों को सुरक्षित निकालने का जूनुन था। घटनास्थल पर अपनों की तलाश में जुटे लोगों की पीड़ा और माथे पर चिंता की लकीरें थीं, पर हम इस प्राकृतिक आपदा के सामने हार मानने को तैयार नहीं थे।


इच्छा शक्ति से हर सपना होगा साकार

लड़कियां जो आईपीएस बनकर समाज की सेवा करना चाहती हैं उनके लिए मेरा यही संदेश है, दृढ़ इच्छाशक्ति से हर सपना साकार होता है। जीवन में संतुलन बनाकर चलना अच्छी बात है, लेकिन विपरीत परिस्थति में प्राथमिकता तय करनी चाहिए। मेरी यही सलाह है कि हिम्मत से हर काम संभव है।

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