पं. रामेश्वर शर्मावेदांत एवं भक्ति साहित्य विशेषज्ञ | वाराणसी, उत्तर प्रदेश
20 से अधिक वर्षों से वैदिक साहित्य और भक्ति परंपरा का अध्ययन-अध्यापन। रामचरितमानस और तुलसीदास के साहित्य में विशेष रुचि। इस लेख में दिए गए भावार्थ मूल अवधी पाठ और प्रामाणिक टीकाओं पर आधारित हैं।
हनुमान चालीसा क्या है?
हनुमान चालीसा भगवान श्री हनुमान की स्तुति में रचित एक महान भक्ति-काव्य है। "चालीसा" का अर्थ है चालीस — इसमें 40 चौपाइयाँ हैं जो अवधी भाषा में लिखी गई हैं। यह भारत में सर्वाधिक पढ़ी जाने वाली धार्मिक रचनाओं में से एक है।
इसे गोस्वामी तुलसीदास ने 16वीं शताब्दी में रचा था। प्रतिदिन करोड़ों हिंदू भक्त इसका पाठ करते हैं। इसे भय, संकट, रोग और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करने वाला माना जाता है।
✍️ रचयिता एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
गोस्वामी तुलसीदास (1532–1623 ई.) हिंदी भक्ति-काव्य के शिखर पुरुष हैं। वे रामचरितमानस के रचयिता हैं। हनुमान चालीसा उनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध लघु रचना है।
एक प्रचलित कथा के अनुसार, तुलसीदास ने यह चालीसा तब रची जब मुगल सम्राट अकबर ने उन्हें बंदी बनाया था। हनुमानजी की कृपा से वे मुक्त हुए और इसी अनुभव से प्रेरित होकर उन्होंने यह स्तुति लिखी।
यह रचना सार्वजनिक डोमेन में है और हिंदू धर्म की साझी सांस्कृतिक विरासत का अंग है।
🌟 हनुमान चालीसा के पाठ के लाभ
🧘
मानसिक शांति
💪
बल और साहस
🛡️
भय और संकट से रक्षा
📚
बुद्धि और विद्या
🌿
रोग-निवारण
🙏
आध्यात्मिक उन्नति
शास्त्रीय मान्यता के अनुसार नियमित पाठ से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — चारों पुरुषार्थों की सिद्धि होती है। आधुनिक दृष्टि से यह ध्यान, एकाग्रता और सकारात्मक मनोभाव विकसित करने में भी सहायक है।
📿 हनुमान चालीसा का पाठ कैसे और कब करें?
समय: प्रातःकाल स्नान के बाद या सायंकाल सूर्यास्त के समय।
विशेष दिन: मंगलवार और शनिवार — हनुमानजी के प्रिय दिन।
विधि: पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। दीपक जलाएँ, हनुमानजी का चित्र या मूर्ति सामने रखें।
संकट के समय: 108 बार पाठ करने की परंपरा है।
समापन: पाठ के बाद आरती करें और प्रसाद वितरित करें।
॥ सम्पूर्ण हनुमान चालीसा — हिंदी अर्थ सहित ॥
Hanuman Chalisa Lyrics with Hindi Meaning — प्रत्येक पंक्ति का सरल भावार्थ
ℹ️ हनुमान चालीसा गोस्वामी तुलसीदास कृत है और सार्वजनिक डोमेन (public domain) में है। नीचे दिए भावार्थ प्रामाणिक टीकाओं पर आधारित हैं।
॥ दोहा – १ ॥
श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनऊँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥
भावार्थ
मैं अपने सद्गुरु के चरण-कमलों की पावन धूल से मन रूपी दर्पण को स्वच्छ करता हूँ, और तब श्रीरामचंद्र के निर्मल यश का वर्णन करता हूँ — जो यश धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, इन चारों फलों का दाता है।
मैं अपने को बुद्धि-हीन जानते हुए पवनपुत्र श्री हनुमान का स्मरण करता हूँ। हे हनुमानजी! मुझे शारीरिक बल, मेधा-बुद्धि और विद्या प्रदान करें तथा मेरे सभी दुःखों और दोषों को दूर करें।
1 चौपाई १–२
जय हनुमान ज्ञान गुण सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥
भावार्थ
हे हनुमानजी! आपकी जय हो। आप ज्ञान और सद्गुणों के अपार सागर हैं। हे वानर-श्रेष्ठ! तीनों लोकों में आपकी कीर्ति प्रकाशमान है।
राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥
भावार्थ
आप श्रीराम के परम दूत और अतुलनीय बल के भंडार हैं। आप माता अंजनी के पुत्र और पवनदेव के सुपुत्र हैं — इसीलिए "पवनसुत" कहलाते हैं।
2 चौपाई ३–४
महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी॥
भावार्थ
आप महावीर हैं — अद्भुत पराक्रमी। आपका शरीर वज्र समान कठोर और अजेय है। आप दुर्बुद्धि (बुरी सोच) को दूर करते हैं और सुबुद्धि (अच्छी सोच) के संगी-साथी हैं।
कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुंडल कुंचित केसा॥
भावार्थ
आपका वर्ण सोने के समान उज्ज्वल और कान्तिमय है। आपका वेश अत्यंत सुंदर है — कानों में कुंडल और घुँघराले केश शोभित हैं।
3 चौपाई ५–६
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै। काँधे मूँज जनेऊ साजै॥
भावार्थ
आपके हाथों में वज्र और ध्वजा शोभित हैं। कंधे पर मुंज (एक प्रकार की घास) से बना जनेऊ धारण किए हुए हैं — जो ब्रह्मचर्य और विद्या का प्रतीक है।
शंकर सुवन केसरी नंदन। तेज प्रताप महा जग वंदन॥
भावार्थ
आप भगवान शंकर के अंश (रुद्रावतार) हैं और केसरी के प्रिय पुत्र हैं। आपका तेज और प्रताप इतना महान है कि सम्पूर्ण संसार आपकी वंदना करता है।
4 चौपाई ७–८
विद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर॥
भावार्थ
आप अत्यंत विद्वान, बहुगुणी और परम चतुर हैं। इन सब गुणों के बावजूद आप सदैव श्रीराम का कार्य करने को उत्सुक और तत्पर रहते हैं — यही आपकी सबसे बड़ी विशेषता है।
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया॥
भावार्थ
आप प्रभु श्रीराम के चरित्र और लीलाओं को सुनने के रसिक (प्रेमी) हैं। श्रीराम, लक्ष्मण और माता सीता — ये तीनों आपके हृदय में सदा निवास करते हैं।
5 चौपाई ९–१०
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा॥
भावार्थ
आपने अत्यंत छोटा (सूक्ष्म) रूप धारण करके माता सीता को अशोक वाटिका में दर्शन दिए और राम का संदेश पहुँचाया। फिर विकराल रूप धारण कर लंका को जला डाला।
भीम रूप धरि असुर सँहारे। रामचंद्र के काज सँवारे॥
भावार्थ
आपने विशाल और भयंकर रूप धारण कर राक्षसों का संहार किया और इस प्रकार श्रीरामचंद्र का समस्त कार्य पूर्ण किया।
6 चौपाई ११–१२
लाय सजीवन लखन जियाए। श्रीरघुबीर हरषि उर लाए॥
भावार्थ
आपने हिमालय से संजीवनी बूटी लाकर मूर्च्छित लक्ष्मण को जीवित किया। इससे प्रसन्न होकर श्रीराम ने आपको हृदय से लगा लिया।
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥
भावार्थ
श्रीराम ने आपकी बहुत प्रशंसा की और कहा — "हे हनुमान! तुम मुझे अपने प्रिय भाई भरत के समान प्रिय हो।" यह आपके प्रति राम का परम स्नेह-वचन है।
7 चौपाई १३–१४
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥
भावार्थ
श्रीराम ने कहा — "हज़ार मुखों से भी तुम्हारा यश गाया जाए तो भी कम है।" ऐसा कहकर श्रीपति (लक्ष्मी के स्वामी) राम ने आपको गले लगा लिया।
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा॥
भावार्थ
सनकादि ऋषि, ब्रह्मा, देवर्षि नारद, माँ सरस्वती और शेषनाग — ये सभी महान विभूतियाँ आपकी महिमा का गुणगान करती हैं।
8 चौपाई १५–१६
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते। कवि कोविद कहि सके कहाँ ते॥
भावार्थ
यमराज, कुबेर और दसों दिशाओं के रक्षक दिक्पाल भी आपकी महिमा का पूरा वर्णन करने में असमर्थ हैं। फिर साधारण कवि और विद्वान कहाँ से कर पाएंगे!
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा॥
भावार्थ
आपने सुग्रीव पर महान उपकार किया — उन्हें श्रीराम से मिलाया और राज्यपद दिलाया। बाली के भय से छिपे सुग्रीव को आपने ही आशा और सहारा दिया।
9 चौपाई १७–१८
तुम्हरो मंत्र विभीषण माना। लंकेश्वर भए सब जग जाना॥
भावार्थ
विभीषण ने आपका उपदेश और परामर्श स्वीकार किया और राम की शरण ली। परिणामस्वरूप वे लंका के राजा बने — यह सारा संसार जानता है।
जुग सहस्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥
भावार्थ
हज़ारों योजन दूर स्थित सूर्य को आपने बचपन में एक मीठा फल समझकर निगल लिया था। यह आपकी बाल-लीला का अद्भुत प्रमाण है।
10 चौपाई १९–२०
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लाँघि गए अचरज नाहीं॥
भावार्थ
श्रीराम की अंगूठी को मुँह में रखकर आपने विशाल समुद्र को पार कर लिया। यह आश्चर्य की बात नहीं — क्योंकि जिसे राम का आशीर्वाद और स्मरण हो, उसके लिए कोई भी कार्य असंभव नहीं।
दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥
भावार्थ
इस संसार में जितने भी दुःसाध्य और कठिन कार्य हैं, वे सब आपकी कृपा और अनुग्रह से सहज और सुगम हो जाते हैं।
11 चौपाई २१–२२
राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥
भावार्थ
आप श्रीराम के द्वार के परम रक्षक हैं। आपकी आज्ञा और अनुमति के बिना कोई भी — किसी भी रूप में — प्रभु राम के निकट नहीं जा सकता।
सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रक्षक काहू को डरना॥
भावार्थ
जो आपकी शरण में आ जाता है, उसे सभी सुखों की प्राप्ति होती है। जब आप रक्षक हों तो फिर किसी से कोई भय नहीं रहता।
12 चौपाई २३–२४
आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हाँक तें काँपै॥
भावार्थ
आपका तेज और ऊर्जा इतनी प्रचंड है कि उसे आप स्वयं ही संभाले रहते हैं। आपकी एक हुंकार से तीनों लोक (स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल) काँप उठते हैं।
भूत पिशाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै॥
भावार्थ
भूत और पिशाच कभी निकट नहीं आ सकते — जब महाबीर हनुमान का नाम उच्चारित किया जाए। आपका नाम ही सभी नकारात्मक शक्तियों का नाशक है।
13 चौपाई २५–२६
नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा॥
भावार्थ
हे वीर हनुमान! आपका निरंतर जप करने से सभी रोग नष्ट होते हैं और सभी प्रकार की पीड़ाएं दूर हो जाती हैं।
संकट तें हनुमान छुड़ावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥
भावार्थ
जो व्यक्ति मन, कर्म और वचन — तीनों से हनुमानजी का ध्यान करता है, हनुमानजी उसे सभी संकटों से मुक्त कराते हैं।
14 चौपाई २७–२८
सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा॥
भावार्थ
श्रीराम सर्वश्रेष्ठ तपस्वी राजा हैं और उनके सभी कार्यों को आपने ही सँवारा और पूरा किया है। आप राम के सर्वाधिक विश्वसनीय सेवक हैं।
और मनोरथ जो कोई लावै। सोइ अमित जीवन फल पावै॥
भावार्थ
जो भी व्यक्ति अपनी मनोकामना लेकर आपके पास आता है, वह अपने जीवन में असीमित फल और सफलता प्राप्त करता है।
15 चौपाई २९–३०
चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा॥
भावार्थ
सत्युग, त्रेता, द्वापर और कलियुग — चारों युगों में आपका प्रताप प्रसिद्ध है। सम्पूर्ण जगत में आपकी महिमा का प्रकाश फैला हुआ है।
साधु संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे॥
भावार्थ
आप साधु-संतों के रक्षक हैं और असुरों के नाशक हैं। आप श्रीराम के परम प्रिय हैं।
हे पवन-पुत्र! आप संकट-हरण करने वाले और मंगलमूर्ति हैं। हे देवताओं के राजा! श्रीराम, लक्ष्मण और सीता सहित आप मेरे हृदय में सदा निवास करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Hanuman Chalisa FAQ — frequently asked questions
गोस्वामी तुलसीदास ने 16वीं शताब्दी (लगभग 1532–1623 ई.) में अवधी भाषा में हनुमान चालीसा की रचना की। वे रामचरितमानस के भी रचयिता हैं। यह रचना सार्वजनिक डोमेन में है।
"चालीसा" का अर्थ है चालीस। इसमें 2 दोहे (आरम्भ और अंत में) और बीच में 40 चौपाइयाँ हैं। कुल मिलाकर यह एक सम्पूर्ण एवं संक्षिप्त स्तोत्र है जो लगभग 7-10 मिनट में पढ़ा जा सकता है।
प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान के बाद एक बार पाठ श्रेष्ठ है। मंगलवार और शनिवार विशेष फलदायी हैं। संकट के समय 11, 21, 51 या 108 बार पाठ करने की परंपरा है। चालीसा में स्वयं 100 बार पाठ का उल्लेख है।
हाँ, बिल्कुल। हनुमान चालीसा सभी भक्तों के लिए है — स्त्री, पुरुष, बालक सभी इसका पाठ कर सकते हैं। भक्ति में कोई भेद नहीं होता।
हनुमान चालीसा अवधी भाषा में लिखी गई है जो हिंदी की एक पुरानी बोली है और उत्तर भारत में प्रचलित रही है। इसीलिए कुछ शब्द आधुनिक हिंदी से भिन्न लगते हैं — जैसे "बरनऊँ", "सुमिरौं", "लील्यो" आदि।
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