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देवभूमि का लोकपर्व ‘हरेला’: जानिए क्यों मनाया जाता है प्रकृति और शिव-पार्वती के प्रेम का यह अनूठा उत्सव

विशेष रिपोर्ट: अभिनव बोरा (uttarakhandhindinews.in)
देहरादून/अल्मोड़ा:
उत्तराखंड की संस्कृति, परंपरा और प्रकृति का आपसी रिश्ता बेहद गहरा है। जब भी सावन के महीने की शुरुआत होती है, देवभूमि के पहाड़ों में एक अनोखी रौनक बिखर जाती है। इस रौनक की सबसे बड़ी वजह है— ‘हरेला’ (Harela)। यह केवल एक त्योहार नहीं है, बल्कि प्रकृति के प्रति आभार जताने, पर्यावरण संरक्षण और शिव-पार्वती के विवाह का एक पावन उत्सव है। मुख्य रूप से कुमाऊं क्षेत्र में धूमधाम से मनाया जाने वाला यह पर्व अब पूरे उत्तराखंड की पहचान बन चुका है।
आइए, uttarakhandhindinews.in की इस खास रिपोर्ट में जानते हैं कि हरेला क्यों मनाया जाता है, इसके पीछे क्या लोक कथाएं हैं और यह कैसे हमारे पर्यावरण से जुड़ा है।

उत्तराखंड के प्रसिद्ध हरेला पर्व की पारंपरिक टोकरी, जिसमें हरे-पीले जौ के तिनके, कच्चे फल और भगवान की मिट्टी की मूर्तियां (डिकारे) रखी हैं, और पीछे हरे-भरे पहाड़ नज़र आ रहे हैं।
उत्तराखंड का प्रसिद्ध लोकपर्व हरेला: जब देवभूमि की हरियाली और समृद्ध संस्कृति एक ही फ्रेम में नज़र आती है। यह टोकरी सुख-समृद्धि, अच्छी फसल और प्रकृति के प्रति आभार का प्रतीक है। (सोर्स: uttarakhandhindinews.in)

क्या है हरेला और कैसे होती है इसकी शुरुआत?

‘हरेला‘ शब्द का सीधा अर्थ है— “हरे रंग का तिनका” या “हरियाली का दिन“। यह त्योहार साल में तीन बार आता है (चैत्र, सावन और आश्विन मास में), लेकिन सावन के महीने में आने वाले ‘सावन हरेला’ का धार्मिक और सामाजिक महत्व सबसे ज्यादा है। यह दिन कर्क संक्रांति (जब सूर्य मिथुन राशि से कर्क राशि में प्रवेश करता है) का प्रतीक है, जो वर्षा ऋतु के आगमन की सूचना देता है।

पौधे बोने की अनोखी परंपरा:

हरेला त्योहार से ठीक 9 दिन पहले (आषाढ़ मास के अंत में) घरों के मंदिरों में छोटी-छोटी टोकरियों में मिट्टी भरकर 5, 7 या 9 तरह के अनाज बोए जाते हैं। इनमें मुख्य रूप से गेहूं, जौ, मक्का, उड़द, गहत, सरसों और भट्ट (काला सोयाबीन) शामिल होते हैं।
इन टोकरियों को सीधे धूप से दूर, घर के मंदिर में रखा जाता है और रोज़ सुबह-शाम इनमें पानी छिड़का जाता है। 9 दिनों में ये अनाज सुंदर, लंबी और पीली-हरी पत्तियों में बदल जाते हैं, जिन्हें ‘हरेला’ कहा जाता है। 10वें दिन यानी संक्रांति के दिन इन्हें काटा जाता है।

हरेला के पीछे की पौराणिक और लोक कथाएं

हरेला पर्व के पीछे धार्मिक मान्यताएं और सदियों पुरानी लोक कथाएं जुड़ी हुई हैं, जो इसे बेहद खास बनाती हैं:

1. शिव-पार्वती का विवाह उत्सव (Dikkar Puja)

पहाड़ों में मान्यता है कि सावन के महीने में ही भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। हरेला के दिन कुमाऊं के घरों में मिट्टी के विशेष मूर्तियां बनाई जाती हैं, जिन्हें ‘डिकारे’ (Dikkars) कहा जाता है। इन मूर्तियों में भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान गणेश और कार्तिकेय की आकृतियां होती हैं। इन मिट्टी की मूर्तियों को प्राकृतिक रंगों से सजाकर इनकी पूजा की जाती है और सुख-समृद्धि की कामना की जाती है।

2. प्रकृति का नया जन्म और नई फसल

एक अन्य लोक कथा के अनुसार, यह पर्व राजा भगीरथ द्वारा गंगा को धरती पर लाने और प्रकृति के पुनर्जीवन से भी जोड़ा जाता है। किसान इसे अपनी आने वाली खरीफ की फसल के सूचक के रूप में देखते हैं। यदि टोकरी में हरेला लंबा और घना उगता है, तो माना जाता है कि उस साल खेती बहुत अच्छी होगी।

‘जी रया, जागि रया’: बड़ों का आशीर्वाद और परंपरा

हरेला के दिन सुबह स्नान करने के बाद घर के बुजुर्ग सभी सदस्यों के सिर पर हरेला (हरी पत्तियां) रखकर उन्हें आशीर्वाद देते हैं। इस दौरान कुमाऊंनी भाषा में एक बेहद खूबसूरत लोक-आशीर्वाद गीत गाया जाता है:
“जी रया, जागि रया, तिष्टिया, पनपिया।
यो दिन-बार भेटने रया, दुब क जस जड़ फैल्यो…
स्याव क जस बुद्धि हो, स्याण क जस तराण हो।”
इसका अर्थ है: “तुम जीते रहो, जागरूक रहो, फलो-फूलो। यह त्योहार तुम्हारे जीवन में बार-बार आए। तुम्हारी जड़ें दूब (घास) की तरह फैलें, तुम्हारे पास सियार जैसी चतुर बुद्धि हो और शेर जैसी ताकत हो।”
आशीर्वाद के बाद, पुरुष इन हरी पत्तियों को अपने कानों के पीछे लगाते हैं और महिलाएं इन्हें अपने बालों में सजाती हैं। इसके बाद घर में पूरी, बड़े, खीर और पुए जैसे पारंपरिक पकवान बनाए जाते हैं।

पर्यावरण संरक्षण का सबसे बड़ा संदेश: ‘प्लांटेशन ड्राइव’

बदलते वक्त के साथ हरेला सिर्फ एक धार्मिक त्योहार नहीं रह गया है। अब यह उत्तराखंड का आधिकारिक वृक्षारोपण दिवस भी बन चुका है। राज्य सरकार और स्थानीय लोग इस दिन बड़े पैमाने पर पौधे लगाते हैं।
मान्यता है कि इस दिन अगर पेड़ की एक सूखी टहनी भी मिट्टी में रोप दी जाए, तो वह हरी हो जाती है। ग्लोबल वार्मिंग और पहाड़ों में हो रहे भूस्खलन के इस दौर में, पूर्वजों का शुरू किया गया यह त्योहार हमें याद दिलाता है कि हमारा अस्तित्व तभी तक सुरक्षित है, जब तक हमारे पहाड़ हरे-भरे हैं।
uttarakhandhindinews.in की ओर से आप सभी पाठकों को ‘हरेला पर्व’ की हार्दिक शुभकामनाएं! आइए, इस हरेला पर कम से कम एक पौधा अवश्य लगाएं और अपनी धरती को हरा-भरा बनाएं।

Editorial Team

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