रिसर्च: फूलों की घाटी और हिमाचल में पौधों की 23 प्रजातियां संकटग्रस्त, विलुप्त होने की कगार पर तीन प्रजातियां

फूलों की घाटी
फूलों की घाटी

 वैज्ञानिकों की ओर से किए गए अनुसंधान में पाया गया कि फूलों की घाटी उत्तराखंड और ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क हिमाचल में पौधों की 23 प्रजातियां संकटग्रस्त हैं जबकि तीन प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर हैं। दोनों घाटियों में यह रिसर्च 3200 से 5300 मीटर ऊंचाई पर की गई है। 



भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण संस्थान कोलकाता और जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान कोसी कटारमल की यह परियोजना पश्चिमी हिमालय में राष्ट्रीय उद्यानों के संरक्षण, सतत प्रबंधन और पारिस्थितिकी तथा पुष्पों के मूल्यांकन पर आधारित थी।



वैज्ञानिकों ने पाया कि मानव आबादी के फैलाव, मानव वन्य जीव संघर्ष, वनों का दोहन, औषधीय पौधों का अवैध कारोबार और पर्यटकों के दबाव से जैव विविधता प्रभावित हो रही है। उन्होंने अध्ययन में दोनों जगहों के संरक्षित क्षेत्रों में मानव हस्तक्षेप को पूरी तरह प्रतिबंधित करने का सुझाव दिया। अनुसंधान में संबंधित संस्थानों के डॉ. एए माओ,  डॉ. वीके सिन्हा, डॉ. कुमार अंबरीश, डॉ. चंद्र सीकर, डॉ. परमजीत सिंह ने मार्गदर्शन किया। 


फूलों की घाटी में 15 प्रजातियों पर संकट

फूलों की घाटी में 614 वर्ग के पौधों को सूचीबद्ध किया गया है, जबकि वनस्पति विविधता में 72 प्रजातियों के नए पौधों को जोड़ने में सफलता मिली है। वैज्ञानिकों के अनुसार 15 संकटग्रस्त पौधों के अध्ययन में सामने आया कि यहां 13 प्रजातियों की संख्या लगातार घट रही है। सर्प मक्का, ब्रह्मकमल, कुटकी, दूधिया विष, अतीष, चरक, पासाण भेद, अरार आदि प्रजातियां संकटग्रस्त हैं।

ग्रेट हिमालयन में आठ प्रजाति संकट में, तीन विलुप्त की कगार पर

ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क हिमाचल प्रदेश में 966 वर्ग के पौधों पर अध्ययन किया गया। जैव विविधता में 134 नए पौधों को जोड़ने में सफलता मिली। यहां 360 किस्म के पौधों में आठ प्रजाति संकटग्रस्त और तीन विलुप्त होने की कगार पर हैं। इनमें वन ककड़ी और नीली पॉपी शामिल हैं।


वैश्विक रूप से जैव विविधता के लिए चिन्हित इन स्थलों पर किया गया यह अध्ययन हिमालयी क्षेत्रों में जैव विविधता संरक्षण के साथ मानव उपयोगी औषधियों व वनस्पतियों के संरक्षण की दिशा में किया गया उल्लेखनीय काम है। प्राकृतिक संसाधनों के सतत प्रबंधन के साथ जलवायु परिवर्तन के दौर में संरक्षण की रणनीतियों को बनाने में भी यह सहायक होगा।

- इंजीनियर किरीट कुमार, नोडल अधिकारी, राष्ट्रीय हिमालयी अध्ययन मिशन

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